C.M.P. Degree College, Prayagraj
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चौधरी महादेव प्रसाद
लेखक: प्रो० अर्चना खरे
ज्ञान, धर्म और परोपकार से युग की धारा को प्रवर्तित करने वाले, चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय के संस्थापक का जीवन-वृत्त।
परिचय
इतिहास के पृष्ठों में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते है जो सदैव के लिए अमर हो जाते हैं। चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय के संस्थापक चौधरी महादेव प्रसाद ने ज्ञान, धर्म और परोपकार से युग की धारा को प्रवर्तित किया तथा सम्पूर्ण जीवन समाज और शिक्षा के विकास में अर्पित कर दिया।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
चौधरी महादेव प्रसाद का जन्म १८५७ ई० को महाशिवरात्रि के दिन धार्मिक स्थल कड़ा में हुआ था। आदिदेव शिव के नाम पर उनका नाम महादेव रखा गया। उनके पितामह चौधरी सूबालाल पत्थर के बड़े व्यापारी व तालुकेदार थे, उस समय बिहार के भू-स्वामित्व में डंकिनी बन्दोबस्त प्रचलित था जिसमें निश्चित समय पर मालगुजारी न चुका पाने पर जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी, इसी प्रकार की नीलामी से प्राप्त जमींदारी उन्होंने मुजफ्फरपुर जिले में प्राप्त की। उनकी जमींदारी इलाहाबाद, बांदा, बनारस, दरभंगा तथा मुजफ्फरपुर तक फैली थी।
महादेव प्रसाद जी के पिता चौधरी रुद्रप्रसाद जी थे उनकी तीन बहनें थी उनका विवाह वाराणसी के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा घर में ही हुई। वे संस्कृत व उर्दू के ज्ञाता थे। चौधरी साहब अनुशासन प्रिय, समय के पाबन्द थे, सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक रहते थे। वह कालखण्ड भारतीय इतिहास में पुनर्जागरण, राष्ट्रवाद, धार्मिक सामाजिक सुधारों के आन्दोलन के बीजारोपण का काल था।
शिक्षा हेतु समर्पण
महादेव प्रसाद जी का संवेदनशील मन भी इससे अछूता न रह सका। उन्होंने पराधीनता की पीड़ा को महसूस किया। राष्ट्र के गौरव की पुनर्स्थापना उनके हृदय में भी आकार ले रही थी, उन्होंने शिक्षा को ही प्रगतिशील विचारों व नवीन चेतना के संचार का माध्यम समझा तथा इस बड़ी जिम्मेदारी के निर्वहन हेतु १९१४ में एक वसीयत की तथा "बाबू महादेव प्रसाद ट्रस्ट" की स्थापना की। इस ट्रस्ट का मुतवल्ली, अध्यक्ष कायस्थ पाठशाला को बनाया तथा वसीयत करके पूरी चल तथा अचल सम्पत्ति कायस्थ पाठशाला को दी, साथ ही प्रावधान किया कि सम्पत्ति से अर्जित होने वाल आय का ५० प्रतिशत गरीब बच्चों की शिक्षा में प्रयोग किया जाय।
उसी समय उन्होंने एक लाख रुपए का नकद दान उच्च शिक्षा हेतु दिया जिस राशी से १९५० में चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय की स्थापना हुई।
धार्मिक एवं सामाजिक कार्य
चौधरी महादेव प्रसाद बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे परम धार्मिक, दानी तथा समाजसेवी थे, धार्मिक स्थलों, शिव मन्दिरों का निर्माण, गरीब छात्रों की मदद करना, निर्धन कन्याओं के विवाह में सहायता करना उनका स्वभाव था। उन्होंने कड़ा धाम में कोठी, शिवालय, बिहार के नानपुर में ५२ बीघा भूमि में शिवालय, भूलभुलैया, पक्के तालाब, अस्पताल का निर्माण करवाया। काशी में एक शिवमंदिर का निर्माण करवाया, १८६३ में प्रयागराज में कल्याणी देवी मन्दिर का निर्माण करवाया।
उनकी प्रशासनिक क्षमता भी उच्चकोटी की थी। रईसे-आजम चौधरी साहब दिल से उदार थे, पारिवारिक उत्सव में पूरी बिरादरी को शामिल करना उनका प्रिय शौक था। अपने नवासे चौधरी नौनिहाल सिंह के जन्म पर उन्होंने पूरे काशीवासियों को दावत में बुलाया, कहते हैं तीन दिन तक बनारस में फल, सब्जी, मिठाई खत्म हो गई थी।
गुरु भक्ति एवं आयुर्वेद
आयुर्वेदिक दवाओं व चिकित्सा पद्धति में उनकी गहरी रुचि थी। महादेव प्रसाद जी के गुरु श्री भाष्करानन्द सरस्वती १००८ थे। गुरु के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा थी, उन्होंने गुरु की पुस्तकें स्वराज सिद्धि व अनुभूति विवरण दर्श को प्रकाशित करवाया। दुर्गाकुण्ड, आनन्द बाग में उनकी समाधि के रखरखाव का प्रबन्ध किया।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु उन्होंने २५०००/- की धनराशि महामना मदन मोहन मालवीय को प्रदान की।
जीवन के अन्तिम दिन
उनके जीवन के अन्तिम दिनों में एक आश्चर्यजनक घटना हुई। उन्हें एक अनाम महात्मा का पत्र तथा एक यंत्र मिला। पत्र में लिखा था यंत्र को जला देना, जिससे वे रोगमुक्त हो जाएगें। वीतरागी चौधरी महादेव प्रसाद ने यंत्र को जलाया नहीं तब महात्मा जी कुछ वर्षों तक दवा भेजते रहे, जब दवा आना बन्द हो गई तब वे काशी आ गए तथा जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने काशी प्रवास किया। उनका देहावसान १९२४ में हुआ।
विरासत
उनका जीवन भावी पीढ़ियों हेतु प्रेरणाश्रोत है। वे एक विचार के रूप में हजारों विद्यार्थियों की आँखों में उनकी दिव्य दृष्टि उनके सपनों में जीवित हैं। उन्होंने स्थापित किया कि शिक्षा व्यापार नहीं समाज का कर्तव्य है। यह उनकी कामना है, उनका यह फलीभूत स्वपन उन्नति के नए आयामों को तय करता रहे। उनके सपनों का ही परिणाम है कि आज महाविद्यालय हीरक जयन्ती वर्ष में प्रवेश कर गया है।
- जन्म १८५७ ई०, कड़ा
- पिता चौधरी रुद्रप्रसाद
- पितामह चौधरी सूबालाल
- गुरु भाष्करानन्द सरस्वती १००८
- ट्रस्ट स्थापना १९१४
- महाविद्यालय स्थापना १९५०
- देहावसान १९२४, काशी
- कड़ा धाम में कोठी एवं शिवालय
- नानपुर (बिहार) में ५२ बीघा भूमि पर शिवालय, भूलभुलैया, पक्का तालाब, अस्पताल
- काशी में शिवमंदिर निर्माण
- १८६३ में प्रयागराज में कल्याणी देवी मन्दिर निर्माण
- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हेतु २५,०००/- का दान
लेख स्रोत
प्रो० अर्चना खरे